اوڑھ کر مٹّی کی چادر وہ لحد میں سو گئے
جو بہت مغرور اپنے مال و زر پر تھے کبھی
ओढ़ कर मिट्टी की चादर वह लहद मे सो गये
जो बहुत मगरूर अपने मालो ज़र पर थे कभी
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तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था
फिर इसके बाद मुझे कोई अजनबी ना मिला
- डॉ. बशीर बद
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कुछ दिन की और कश्मकशे-जीस्त है 'असर',अच्छी बुरी गुजरनी थी, जैसी गुजर गई।
- असर लखनवी
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खिज्रे-मंजिल से कम नहीं ऐ दोस्त,एक हमदर्द अजनबी का खुलूस।
- रविश सिद्दीकी
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तेरे और उसके दरमियाँ, तेरी खुदी हिजाब है,अपना निशान खोयेजा, उसका निशान पायेजा।
- अख्तर शीरानी
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उसकी कत्थई आँखों में हैं जंतर-मंतर सब,
चाक़ू-वाक़ू, छुरियाँ-वुरियाँ, ख़ंजर-वंजर सब....
- राहत इन्दौरी
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वो अच्छा है तो अच्छा है,बुरा है तो भी अच्छा है
मिज़ाज -ए-इश्क मैं ऐब-ए-यार देखे नहीं जाते
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